ज़िद - हिंदी कविता * ZID HINDI KAVITA
क्या ज़िद थी तेरी के दूर हो गए सही होके भी हम गलत हो गए तेरे फैसलों ने मजबूर इतना किया के पास रहके भी तुझसे दूर हो गए सच साबित न कर सके हम कभी भी और झूठ के आगे तेरे मजबूर हो गए जो तूने कहा वो सह न सके हम क्या सामना करते नज़र से दूर हो गए जो उम्मीद थी मेरी वो न उम्मीद हो गई जिसे साथ देना था वो सबसे पहले दूर हो गए क्या खबर थी यूँ बिखरेगा आशियान मेरा के घर जोड़ने वाला ही तोड़ेगा घर मेरा