जिंदगी हर मोड़ पे बदल जाती है
कभी उलझती है तो कभी सुलझ जाती है
जिंदगी क्या कहें हर मोड़ पे बदल जाती है
आंखों को सपने दिखा नींद से जगाती है
बिना पंखों के उड़ना सिखाती है
मन के वेग को ख़ाहिश के आसमानों तक
क्षितीज के पास कहीं दूर तलक जाती है
कभी उलझती है तो कभी सुलझ जाती है
जिंदगी क्या कहें हर मोड़ पे बदल जाती है
समन्दर को आसमान और आसमान को समंदर बनती है
डूबे हुए को भी किनारे लगाती है
टिमटिमाते तारों को टूटना सिखाती है
जिंदगी क्या कहें उंगलियों से रेत जैसी फिसल जाती है
पलक झपकते ही एक उम्र गुजर जाती है
किस्से कहानियों सी जिंदगी हकीकत बन जाती है
जिंदगी क्या कहें हर मोड़ पे बदल जाती है...
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