ልጥፎች

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राधे संग कान्हा का प्रेम, श्रीं राधे कृष्णा बाल रूप प्रसंग, श्री कृष्ण वृंदावन

कान्हा जाओ मैं तुमसे रूठी, हर बात तेरी होती झूठी  खाई थी कसम ना तोड़ेंगे  मटकी गागर देख गुलेरी छूटी  चीर छुपाये नदिया के तीरे ओढ़नि लहराए कदंब के नीचे  बाट देखेंगी मैया ना रोको कन्हैया दूंगी तोहे माखन मिस्री  नंद के लाल ना कर बरजोरी बहुत हुई तोरी आंख  मिचौनि दाऊ अब आपहु कुछ बोलो गोधूलि हुई मोरी नंदिनी फेरों  सुदामा तुम तो सखा हो प्यारे बोलो कान्हा काहे  इतराए  सब सखियाँ भी दे है उलाहना नटखट कन्हैया का रोज सताना  मैया से कहूँगी मैं तेरी कन्हैया ना भेजो ग्वालों संग कृष्ण को मैया  काली गईया का दुध रोज कान्हा पियत है बछवां भी उसका मुंह लखत है  रिसीया गए कान्हा कहन लगे राधा से,  हसी ठिठोली और कठबैठी... बहुत हुई अब मेरी चुगली  ना बोलूंगा राधे तुमसे,  तोड़ दयी जा प्रीत पुरानी  तड़पे जाल में खग और मछली बिन जल के  तड़प रही राधिका मोहन के बिन ऐसे  बाट देखत पथरा गई अंखियआ नैनो से कजरा बह गया रसिया  काहे कछू कहो तोसे मोहन मैंने,  सुनकर दो आखर बिसरा गए सब प्रीतिया  तोहे देखन खातिर पनघट पर जाऊँ, स...