वृंदा - मेरी बछीया, Hindi Story Of My Pet Vrinda - The Calf story of love, care and attachment, Animals love
वृंदा मिली जब तीन महीने की थी,सफेद रंग और माथे पर श्वेत टिकउला , छोटा कद ओर हिरनी आँखे l
इठला के चलती, लगती नखरिली जैसे हो महारानी घर की, लाल रंग की घंटी कंठ में टन टन हरदम करती रहती I
तीन दिन तक खडी रही डर से डोरी में बंधी रही बस आँखों से आँसू बहें शायद अपनी माँ को ढूँढ रही
खिलाई रोटी हाथों से, चोकर और पशु आहार दिया, माथे में कुमकुम लगा के उसका घर में सत्कार किया
धीरे धीरे हुई पुरानी अब करती है मनमानी सुबह और शाम की रोटी पहले वृंदा को भोग लगानी I
है उसमें बच्चों की जान अपने घर की वही है शान नित्य नियम पाँव छूना उसके करते है जीना आसान
आभास उसको हो जाता है जब कान खड़े हो जाते है, पड़ोसी के घर हुई चोरी तब वृंदा की घंटी सुन... चोर भी भाग जाते है I
तीन साल की हुई है अब सुन्दर गईया लगती है एक बार जो देखे उसको दिल से तारीफ निकलती है
पिछले माह खुल गई थी खूँटे से , ना जाने कहां निकल गई ...ढूँढ रहा था पूरा घर उसको फिर भी वृंदा नहीं मिली
थक हार कर बैठ गए सोचा शायद खो गई वो पूछा गाँव के चरवाहों से लेकिन किसी को नहीं दिखी वो
दिखलाई उसकी तस्वीरें एक बोला शायद देखा है पहाड़ी के ऊंचे टीले पे गायों का एक तबेला है, फिर से देखूँगा कल जाके किस बात का रोना है...प्यार करते हो उससे इतना ये हम सबने जाना है
भ्रमित हुई है पथ से अपने उसको भी एहसास है आ जाएगी जल्दी वो ये मेरा विश्वास है I
बार बार उसको उठ के देखें नीद नहीं थी आंखों में खाली पडी थी घर की दुवारि राधारानी नहीं थी बरसाने में
खबर मिली फिर उसकी हमको जंगल में थी विचर रही जाके देखा उसको तो अपनी माँ का माथा सहला रही
खुशी हुई खुश देख के उसको आंखों से आँसू छलक गए माँ बेटी का प्रेम देख के वापिस घर आ गए
दुख भी था और खुशी भी थी..घर सूना सुना लगता था टन टन की गूंज होती थी तो घर मंदिर जैसा लगता था I
थी हाथ में गुड़ और रोटी देख रही थी उसकी होंदी सोच रही थी अपने मन में माँ की जगह नहीं ले सकती, माँ तो अखिर माँ ही होती अनमोल जिसकी कीमत होतीं
संतोष करके सो गई, ना जाने कितनी बार वृंदा की घंटी बजी जानती थी भ्रम है ये, वृंदा नहीं मेरी आदत है ये
भोर हुई किवाडी खुली सामने देखा तो वृंदा और उसकी माँ थी खड़ी आंखें मली और पाँव छुए I भीतर से गुड़ ले आयी खिला के उसका माथा चूमा घर की बिटिया घर वापिस आयी l
ना जाने क्या रिश्ता है अपना, दिन भर रहती है माँ के संग रात को आती है अपने घर II
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