कर्मों का खेल, महादेव शायरी, अहंकार कपट और ईश्वर

वो अपने वहम को सच मान बैठे
सोने की काया को पत्थर कर बैठे
अपने अहंकार में गिर गये इतना
माथे के चन्दन को खुद रौंध बैठे l l

अंतर आइना देखते तो सच जान जाते
कभी तो रूप को अपनी पहचान जाते 
है कपट, स्वार्थ और छलावा दिखावा 
ना जाने कैसे ईश्वर से नज़रे मिलाते l l

कैसा ये भ्रम है,  कैसी ये भ्रांति
सोने के हिरण ने सीता मैया भरमा दी 
मैं ही मैं हूं सर्वोत्तम और श्रेष्ठ
इसी सोच ने रावण की हस्ती मिटा दी l l

असल में खेल है कर्मों का सारा
जो दिया तूने वही पलट के आया दुबारा l l

हर चाल तेरी उसको पता है 
है आंखें बंद पर सब देखता है 
तुझे तुझसे ज़्यादा वो पहचानता है 
हक़ीक़त को तेरी वो जनता है  l l

वो ऊपर बैठा ईश्वर है सभी का
जान के भी अंजान रचियता जगत का 
तेरे दाऊ पेच सब उसकी नज़र है
उसके हाथ में ही कर्मो की कलम  है l l

टेढ़ी चाल को भी जो सीधी कर दे 
पल में प्रलय को भी शांत करदे
कृपा उसकी ऐसी के दिशा बदल दे   l l

लिखु कुछ भी मैं महादेव मेरे
शब्दों में मेरे अपना आशीर्वाद दे दे l l

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