कर्मों का खेल, महादेव शायरी, अहंकार कपट और ईश्वर
सोने की काया को पत्थर कर बैठे
अपने अहंकार में गिर गये इतना
माथे के चन्दन को खुद रौंध बैठे l l
अंतर आइना देखते तो सच जान जाते
कभी तो रूप को अपनी पहचान जाते
है कपट, स्वार्थ और छलावा दिखावा
ना जाने कैसे ईश्वर से नज़रे मिलाते l l
कैसा ये भ्रम है, कैसी ये भ्रांति
सोने के हिरण ने सीता मैया भरमा दी
मैं ही मैं हूं सर्वोत्तम और श्रेष्ठ
इसी सोच ने रावण की हस्ती मिटा दी l l
असल में खेल है कर्मों का सारा
जो दिया तूने वही पलट के आया दुबारा l l
हर चाल तेरी उसको पता है
है आंखें बंद पर सब देखता है
तुझे तुझसे ज़्यादा वो पहचानता है
हक़ीक़त को तेरी वो जनता है l l
वो ऊपर बैठा ईश्वर है सभी का
जान के भी अंजान रचियता जगत का
तेरे दाऊ पेच सब उसकी नज़र है
उसके हाथ में ही कर्मो की कलम है l l
टेढ़ी चाल को भी जो सीधी कर दे
पल में प्रलय को भी शांत करदे
कृपा उसकी ऐसी के दिशा बदल दे l l
लिखु कुछ भी मैं महादेव मेरे
शब्दों में मेरे अपना आशीर्वाद दे दे l l
_20260910_172420_0000.png)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
Comments