इक्तफाक़ हुआ ऐसा
कोहरा आंखों से छटा ऐसा
देखा था जो आईना बरसो
उस चेहरे से दिल भरा ऐसा
ओझल होते ही चेहरे के
मन की आँखें खुली
कोई तम्मना कोई उम्मीद
रह न गयी
शीशे का क्या ?
उसने तो चेहरा दिखाया
मन को भरमा के उसे प्रेम बताया
लेकिन ,
निश्चल है प्रेम और उसकी भाषा
पूंजी ऐसी जिसको सबने अपनाया
न खोने का डर न पाने की इच्छा
न जात - पात और द्वेष किसी का
परवाह जिसमे एक दूजे की रहे
और खुद से पहले तुम्हारा ध्यान रहे।

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