धोखा




झूठी.. एक उम्र गुज़ार दी , 

जो ना थी खबर.. वो  छाप दी। 


कहने को तो.. हम सब कुछ थे ,

पर फिर भी.. तेरी रजा जान ली।। 


एक आस में हम - रह गए ,
तेरा दर्द शायद - सह गए


आंखें खुली तो, ज्ञात आया । 

बस धोखा,  ही हाथ आया ।। 

                                        

टिप्पणियाँ

  1. बहुत खूब लिखा है। आपकी पंक्तियों ने पुरानी यादें फिर ताजा कर दी।

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  2. आंखें खुली तो, ज्ञात आया ।

    बस धोखा, ही हाथ आया ।।

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